Up board model paper 2022 [Chemistry]
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ठोसों में अपूर्णताएँ / Imperfections or defects in Solids (Crystals)
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ठोसों में अपूर्णताएँ आदर्श क्रिस्टलीय ठोस में अवयवी कण एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते हैं परन्तु आदर्श क्रिस्टल केवल परम शून्य ताप (0 K) पर ही पाये जा सकते हैं। परम शून्य ताप से ऊपर किसी भी ताप पर क्रिस्टल में कणों की नियमित व्यवस्था में अनियमितता आ जाती है जिसे ठोसों में अपूर्णता कहते हैं। अपूर्णता का कारण क्रिस्टलीय ठोस छोटे-छोटे क्रिस्टल का समूह होता है जिन्हें लघु क्रिस्टल कहते हैं इनमें दोष होते हैं। ये दोष क्रिस्टल बनते समय उत्पन्न होते हैं जिससे इनके गुण बदल जाते हैं। ये दोष दो प्रकार के होते हैं- 1.बिन्दु दोष 2.रेखीय दोष 1. बिन्दु दोष क्रिस्टलीय ठोस में एक परमाणु (या बिन्दु) के चारों ओर की आदर्श व्यवस्था में अनियमितता होना, बिन्दु दोष कहलाता है। 2. रेखीय दोष क्रिस्टलीय ठोस में परामाणुओं की पूर्ण पंक्ति की आदर्श व्यवस्था में अनियमितता होना, रेखीय दोष कहलाता है। बिन्दु दोष के प्रकार यह तीन प्रकार का होता है- A. रससमीकरणमितीय दोष (Stoichiometric Defects) B. अरससमीकरणमितीय दोष (Non-stoichiometric Defects) C. अशुध्दता दोष (Impurities Defects)...
एकक कोष्ठिका का घनत्व कैसे निकालें (Density of Unit Cell)
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एकक कोष्ठिका का घनत्व ज्ञात करना/Density of Unit Cell माना कि एक्स किरण विवर्तन से ज्ञात घनीय क्रिस्टल की एकक कोष्ठिका के कोर (किनारा या भुजा) की लंबाई a ठोस पदार्थ का घनत्व d तथा मोलर द्रव्यमान M है, घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन = a³ एकक कोष्ठिका का द्रव्यमान = एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या × एक परमाणु का द्रव्यमान = Z x m यहाँ z एक एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या तथा m एक परमाणु का भार है। चूंकि एक मोल (Na) परमाणुओं का ग्राम में द्रव्यमान (मोलर द्रव्यमान) = M अत: एकक कोष्ठिका में उपस्थित एक परमाणु का भार (m) = M/Na यहां Na = आवोगाद्रो संख्या = 6.022 x 10^23 एकक कोष्ठिका का घनत्व (d) = एकक कोष्ठिका का द्रव्यमान/एकक कोष्ठिका का आयतन d = Z×m/V d = Z×M/a³Na पदार्थ और एकक कोष्ठिका का घनत्व बराबर होता है।
काय केन्द्रित या अन्त: केन्द्रित घनीय संरचना (bcc) की संकुलन क्षमता कैसे निकालें
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अन्त: केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका की संकुलन क्षमता दोस्तों बहुत ही आसान है पहले तो आपको bcc संरचना में कुल कण कितने होते हैं और कैसे निकालें जाते हैं पता होना चाहिए। नहीं पता हो तो पिछला पोस्ट पढ़ें, समझ में आ जाएगा। bcc संरचना में केवल दो कण होते हैं इन दोनों कणों द्वारा एकक कोष्ठिका का कितना प्रतिशत स्थान भरा जाता है तो यह स्थान 68% होता है इसका मतलब है कि bcc की संकुलन क्षमता 68% होती है और इसका शेष 32% स्थान खाली होता है जो कणों द्वारा भरा नहीं जाता है।
संकुलन क्षमता क्या है और कैसे निकालें? Packing efficiency of Crystal lattice
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संकुलन क्षमता Packing efficiency किसी क्रिस्टल जालक की संकुलन क्षमता कुल उपलब्ध स्थान का वह प्रतिशत है जो अवयवी कणों द्वारा भरा जाता है। दोस्तों क्रिस्टल जालक में अनेक एकक कोष्ठिकाएं होती हैं। किसी एक एकक कोष्ठिका की संकुलन क्षमता सम्पूर्ण क्रिस्टल जालक की संकुलन क्षमता होती है। सामान्यतः एकक कोष्ठिका को घन माना जाता है और कण को गोला माना जाता है। यहां स्थान का मतलब आयतन है गोला और कण दोनों के आयतन के सूत्र नीचे चित्र में देखें- 1. सरल घनीय जालक या संरचना की संकुलन क्षमता (Simple Cubic Structure) चित्र सहित 2. षट्कोणीय निबिड़ संकुलन (hcp) तथा घनीय निबिड़ संकुलन (ccp या fcc) संरचनाओं की संकुलन क्षमता - hcp तथा fcc (ccp) की संकुलन क्षमता समान होती है। माना एकक कोष्ठिका के किनारे की लम्बाई a और प्रत्येक गोले की त्रिज्या r हैं। चित्र में fcc संरचना के फलक को दिखाया गया है। fcc में घन के कोनों और प्रत्येक फलक के केन्द्र में कण होता है।
त्रिविमीय निविड संकुलन Three Dimensional Close Packing
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त्रिविमीय निबिड़ संकुलन (Three-dimensional Close Packing)- वास्तविक संरचना हमेशा त्रिविमीय होती है। द्विविमीय परतों को एक-दूसरे पर रखकर त्रिविमीय संरचना बनाते है। यह संकुलन दो प्रकार का होता है- (i) वर्गाकार निबिड़ संकुलन से त्रिविमीय संकुलन (ii) षट्कोणीय निबिड़ संकुलन से त्रिविमीय संकुलन 1. द्विविमीय वर्गाकार निबिड़ संकुलन से त्रिविमीय संकुलन बनाना (सरल घनीय जालक) - जब द्वितीय वर्गाकार संकुलित परत को प्रथम परत के ऊपर इस प्रकार रखते हैं कि द्वितीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के ठीक ऊपर हो तो यह संकुलन बनता है। इसमें सभी परतों के गोले क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर रूप से एक सीध में होते हैं। इसमें सभी परतें समान प्रकार की होती हैं अत: इस व्यवस्था को AAA प्रकार की व्यवस्था बोलते हैं। इस प्रकार बने क्रिस्टल जालक को सरल घनीय जालक कहते हैं। इसमें सरल एकक कोष्ठिका होती है। 2. द्विविमीय-षट्कोणीय निबिड़ संकुलन से त्रिविमीय संकुलन बनाना- इसमें षटकोणीय परतों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर त्रिविमीय निबिड़ संकुलित संरचना बनाते हैं। सबसे पहले प्रथम परत के ऊपर द्वितीय परत को रख...
ठोसों में निविड संकुलन (एक-विमीय द्वि-विमीय) Close Packing in Solids
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ठोसों में निविड संकुलन (Close Packed Structure in Solids) ठोस के क्रिस्टल निर्माण में अवयवी कण (परमाणु, अणु या आयन) एक-दूसरे के बहुत अधिक निकट आ जाते हैं कणों के बीच बहुत कम खाली जगह होती है अतः वह व्यवस्था जिसमें क्रिस्टल का अधिकतम भाग अवयवी कणों द्वारा घेरा हुआ होता है और बहुत कम भाग ही खाली(रिक्त) बचता है, निविड संकुलित व्यवस्था कहलाती है। दोस्तों ऐसी स्थिति में अवयवी कण परस्पर चारों ओर से एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं। इस व्यवस्था से ही ठोस अधिकतम स्थायित्व प्राप्त करते हैं। अवयवी कण अलग-अलग आकार के होते हैं। इस कारण निविड संकुलन की व्यवस्थाएँ भी अलग-अलग होती हैं। इन व्यवस्थाओं को समझने के लिए अवयवी कणों को समरूप(एक समान) कठोर गोले माना जाता है। किसी ठोस में अवयवी कणों के निश्चित क्रम के कारण क्रिस्टल का बाहरी आकार बनता है जिसे क्रिस्टल जालक कहते हैं। जब अवयवी कणों की पुनरावृत्ति (Repeat होना) एक सरल रेखा में होती है तो इसे एकविमीय जालक कहते हैं। अवयवी कणों की पुनरावृत्ति किसी तल में होने पर इसे द्विविमीय जालक और अवयवी कणों की पुनरावृत्ति त्रिविम(3D) में होने पर इसे त्रिविम...