ठोस क्या है? ठोस कितने प्रकार के होते हैं? समझें सरल हिन्दी में


कक्षा-12 अध्याय-1 ठोस अवस्था / Solid State
इस अध्याय में सम्मिलित टॉपिक्स निम्नलिखित हैं जब आप इनको क्रम से पढ़ेंगे तो बहुत अच्छा समझ आएगा-

1. ठोस अवस्था के सामान्य अभिलक्षण (General Characteristics of Solid States)

2. बंधन बलों या आकर्षण बलों के आधार पर ठोसों का वर्गीकरण (Classification of solids on the basis of different binding force)

3. क्रिस्टलीय एवं अक्रिस्टलीय ठोस (Crystalline and Amorphous Solids)

4. क्रिस्टल जालक और एकक कोष्ठिका (Crystal Lattice and unit Cell)

5. एकक कोष्ठिका में अवयवी कणों की संख्या (Number of Particles in a Unit Cell)

6. ठोसों में निविड़ संकुलन (Close Packed Structures in Solids)

7. एक एकक कोष्ठिका के घनत्व का परिकलन (संकुलन क्षमता ) Calculation of Density of Unit Cell (Packing efficiency)

8. ठोसों में अपूर्णताएँ (Imperfections or Defects in Solids)

9. ठोसों के विद्युतीय गुणधर्म (Electrical Properties of solids)

10. ठोसों के चुम्बकीय गुण (Magnetic Properties of Solids)

पहले समझें और उसके बाद अपनी कॉपी में नोट्स लिखें  और  चित्र भी बनाएं, ऐसा करने पर आपको याद भी होगा और हाथ से लिखे नोट्स तैयार हो जाएंगे-

ठोस अवस्था (Solid State)-

 पदार्थ या द्रव्य की वह अवस्था जिसमें अवयवी कणों के बीच प्रबल अन्तराण्विक आकर्षण बल होते हैं और इन बलों के कारण कण एक-दूसरे के बहुत अधिक समीप होते हैं उस ठोस अवस्था कहते हैं। जैसे-धातुएं, प्लास्टिक, लवण, आदि ठोस है।
     
ठोस के सामान्य अभिलक्षण या गुण-
1. ठोस पदार्थों के द्रव्यमान, आयतन, आकार एवं आकृति निश्चित होते हैं।

2. ठोस दृढ़ होते हैं।

3. कम तापमान पर कणों की ऊष्मीय ऊर्जा कम होती है अतः ठोसों में अन्तराण्विक आकर्षणआकर्षण प्रबल होते हैं, और इनके अवयवी कणों के मध्य दूरियाँ कम होती हैं।

4. इनके कणों की स्थितियां निश्चित होती है अर्थात् कण एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति नहीं करते हैं केवल अपनी माध्य स्थिति के इर्द–गिर्द कम्पन्न (दोलन) करते हैं।

5. इनका घनत्व द्रव और गैस की तुलना में अधिक होता है।

6. इनमें द्रव और गैस की तुलना में विसरण का गुण कम होता है।

7. ठोस को गर्म करने पर एक निश्चित ताप पर द्रव अवस्था में बदल जाते हैं इस निश्चित ताप को उस ठोस का गलनांक कहते हैं इस प्रक्रम को गलन कहते हैं।

आकर्षण बलों या बंधन बलों के आधार पर ठोस का वर्गीकरण- 
इन बलों की प्रकृति के आधार पर ठोस चार प्रकार के हैं
1. आण्विक ठोस
    a. अध्रुवीय आण्विक ठोस
    b. ध्रुवीय आण्विक ठोस
    c. हाइड्रोजन आबंधित आण्विक ठोस
2. आयनिक ठोस(Ionic Solids)
3. धात्विक ठोस (Metallic Solids)
4. सहसंयोजक या नेटवर्क ठोस (Covalent Solids)

1-आण्विक ठोस (Molecular Solids)
आण्विक ठोस अणुओं से बने होते हैं जिनमें अणु परस्पर दुर्बल वाण्डरवाल बलों या हाइड्रोजन बन्ध द्वारा जुड़े होते हैं अतः इनके गलनांक एवं क्वथनांक कम होते हैं तथा ये प्रत्येक अवस्था में अणुओं के रूप में ही पाये जाते हैं।

ये तीन प्रकार के होते हैं-

अध्रुवीय आण्विक ठोस (Non-polar Molecular Solid)
वे ठोस जिनमें सहसंयोजक बन्ध युक्त अध्रुवीय अणु या परमाणु (उत्कृष्ट गैस) होते हैं उन्हें अध्रुवीय ठोस कहते हैं। इनमें अणुओं के मध्य दुर्बल परिक्षेपण या लंडन बल (वान्डरवाल बल) पाया जाता है। अतः इन ठोसों के गलनांक व क्वथनांक बहुत कम होते हैं तथा ये अतिवाष्पशील होते हैं। ये ठोस मुलायम व वैद्युत के कुचालक होते हैं तथा जल (ध्रुवीय विलायक) में अविलेय होते हैं। ये बहुत कम ताप पर ठोस अवस्था में पाए जाते हैं जबकि कमरे के ताप पर सामान्यतः द्रव या गैस प्रावस्था में होते हैं।
उदाहरण- बहुत कम ताप पर H2, O2, N2, Cl2, CH4, CCl4, He, Ar, Kr, Xe इत्यादि ठोस अवस्था में लाये जा सकते हैं। कुछ पदार्थ कमरे के ताप पर भी ठोस अवस्था में पाये जाते हैं जैसे-ठोस आयोडीन I 2
 
ध्रुवीय आण्विक ठोस (Polar Molecular Solid)
इस प्रकार के ठोस में अणु ध्रुवीय होते हैं जो परस्पर प्रबल वाण्डरवाल बलों द्वारा जुड़े होते हैं। इनमें अणुओं के बीच प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण बल होते हैं। ये सामान्यतः मुलायम, वैद्युत के कुचालक तथा जल में विलेय होते हैं। इनका जलीय विलयन वैद्युत का सुचालक होता क्योंकि जल में ये आयनों में टूट जाते हैं। ये कमरे के ताप पर द्रव या गैसीय अवस्था में होते हैं, जिन्हें निम्न ताप पर ठोस अवस्था में बदला जा सकता है। इनके गलनांक अध्रुवीय ठोस से अधिक होते हैं।
उदाहरण- ठोस HCl(द्रव),  SO2(गैस), CHCl3  (द्रव) आदि। मोम कमरे के ताप पर ठोस होता है।


हाइड्रोजन आबंधित आण्विक ठोस (Hydrogen Bonded Molecular Solid) 
ऐसे ठोस में अणुओं के बीच हाइड्रोजन बंध पाया जाता है जैसे H-F, H2O, NH3, CH3COOH इत्यादि। F, O और N अत्यधिक विद्युत ऋणता वाले तत्व हैं एक अणु का अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व दूसरे अणु के हाइड्रोजन परमाणु को आकर्षित करता है इस आकर्षण को H-बंध कहा जाता है। सामान्य तापों पर ये द्रव होते हैं परन्तु निम्न ताप पर ठोस अवस्था में बदल जाते हैं। ये कम वाष्पशील एवं वैद्युत के कुचालक होते हैं।

2-आयनिक ठोस (Ionic Solids)
इनके अवयवी कण आयन होते हैं। ये उच्च गलनांक व क्वथनांक युक्त दृढ़ ठोस होते हैं क्योंकि इनमें धनायन और ऋणायन के बीच प्रबल स्थिर वैद्युत आकर्षण बल पाया जाता है। ये ठोस कठोर तथा भंगुर प्रकृति के होते हैं तथा जल जैसे ध्रुवीय विलायकों में तुरन्त विलेय हो जाते हैं। गलित अवस्था तथा जलीय विलयन में ये विद्युत के चालक होते हैं। परन्तु ठोस अवस्था में विद्युत के कुचालक होते हैं। इनमें अणु नहीं पाये जाते हैं। ये क्रिस्टल जालक बनाते हैं। इन्हें मूलानुपाती सूत्रों से प्रदर्शित करते हैं जैसे- NaCl, KCl, CaSO4, CuSO4, KClO3 आदि लवण।

3-धात्विक ठोस (Metallic Solids)-
धातुएँ सामान्यत ठोस अवस्था में होती हैं अतः इन्हें धात्विक ठोस कहते हैं। इनमें धनायन मुक्त इलेक्ट्रानों के समुद्र में व्यवस्थित होते हैं। प्रत्येक धातु परमाण, एक या अधिक इलेक्ट्रान देता है जिससे इलेक्ट्रॉनों का समुद्र बनता है। ये इलेक्ट्रान गतिशील होते हैं और क्रिस्टल में समान रूप से फैले रहते हैं। गतिशील इलेक्ट्रानों के कारण ही धातुएं विद्युत एवं ऊष्मा की सुचालक होती हैं। धातुओं का विशेष रंग होता है तथा उनमें चमक पायी जाती है। धातुएं अत्यधिक आघातवर्धनीय एवं तन्य होती हैं, इनकी चादर (Sheets) बनाई जा सकती है तथा इनके तार खींचे जा सकते हैं। ये सामान्यतः ठोस होती है। पारा (Hg) अपवाद है यह द्रव धातु है।
उदाहरण-Cu, Au, Ag, AI, Fe आदि।

4-सहसंयोजक ठोस (Covalent Solid) अथवा नेटवर्क ठोस (Network Solid)-
अधात्विक क्रिस्टलीय ठोसों में परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक बन्ध होता है लेकिन ये विशाल अणु क्रिस्टल बनाते हैं। इनमें छोटे एवं सरल अणु नहीं होते। इनमें परमाणु सहसंयोजक बंध द्वारा आपस में जुड़कर नेटवर्क (जाल) बनाते हैं अतः इन्हें नेटवर्क ठोस भी कहते हैं।
सहसंयोजक बन्ध दिशात्मक एवं प्रबल होता है अत- परमाणु अपनी स्थितियों पर प्रबलता से जुड़कर निश्चित ज्यामिति(आकृति) के किस्टल बनाते हैं।इसलिए ये ठोस अत्यधिक कठोर और भंगुर होते है, इनका गलनांक उच्च होता है। ये कुचालक होते हैं। उदाहरण-हीरा, सिलिकॉन कार्बाइड, सिलिका (SiO2), क्वार्ट्ज, बोरोन नाइट्राइड(BN) तथा ग्रेफाइट।

ग्रेफाइट मुलायम और विद्युत का सुचालक होता है। ग्रेफाइट में कार्बन परमाणु विभिन्न परतों में व्यवस्थित होते हैं और प्रत्येक परमाणु उसी परत के तीन कार्बन परमाणुओं से सहसंयोजक बन्ध बनाता है। प्रत्येक परमाणु का चौथा संयोजकता इलेक्ट्रॉन परतों के मध्य होता है और यह गति के लिए मुक्त होता है। ये मुक्त इलेक्ट्रॉन ही ग्रेफाइट को विद्युत का चालक बनाते हैं। ग्रेफाइट की षट्कोणीय परतें एक दूसरे पर सरलता से खिसक सकती हैं अतः ग्रेफाइट मुलायम ठोस होता है अतः इससे स्नेहक (Solid Lubricant) बनाते हैं।

हीरे में प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से चतुष्फलकीय रूप से जुड़ा रहता हैं, इसमें कोई मुक्त इलेक्ट्रान नहीं होता है यह कुचालक होता है हीरे की त्रिविमीय(3D) संरचना के कारण यह सर्वाधिक कठोर पदार्थ होता है। हीरा तथा ग्रेफाइट कार्बन के अपररूप है।

कणों की व्यवस्था में उपस्थित क्रम के आधार पर ठोस दो प्रकार के होते हैं-
(1) क्रिस्टलीय ठोस (2) अक्रिस्टलीय ठोस

क्रिस्टलीय ठोस
1-वह ठोस जिसमें अवयवी कण त्रिविम (3D) में नियमित क्रम में व्यवस्थित होते हैं क्रिस्टलीय ठोस कहलाता है। इनकी ज्यामिति निश्चित होती है।

2-इनमें अवयवी कणों की दीर्घ परासी व्यवस्था होती है अर्थात् कणों की व्यवस्था का पैटर्न नियमित होता है। सम्पूर्ण क्रिस्टल में दूर तक कणों की व्यवस्था एक समान होती है।

3-इनका गलनांक निश्चित होता है। गलन की ऊष्मा निश्चित होती है।

4-ये वास्तविक ठोस हैं।

5-ये विषमदैशिक ठोस हैं क्योंकि इनके कुछ भौतिक गुणों का मान भिन्न भिन्न दिशाओं में भिन्न भिन्न होता है जैसे-कठोरता, अपवर्तनांक, चालकता आदि।

6-तेज धार वाले औजार से काटने पर यह दो टुकड़ों में टूट जाता है टुकड़ों की सतह चिकनी और सपाट होती है अतः यह विदलन गुण प्रदर्शित करता है।

उदाहरण- सोडियम क्लोराइड (NaCl), क्वार्ट्ज, कॉपर
सल्फेट (CuSO4), लोहा, तांबा, चाँदी, सल्फर, फास्फोरस, जिंक सल्फाइड, नैफ्थैलीन आदि।

अक्रिस्टलीय ठोस
1-वह ठोस जिसमें अवयवी कण नियमित क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं  इनकी निश्चित आकृति(ज्यामिति) नहीं होती है अक्रिस्टलीय ठोस कहलाते हैं।

2-इनका गलनांक व गलन ऊष्मा अनिश्चित होते है तथा इनके शीतलन वक्र सतत् होते हैं।

3-ये ताप के एक निश्चित परास पर नरम हो जाते हैं तथा इन्हें गलाकर एक सांचे में ढाला जा सकता है, अतः इनसे विभिन्न आकृतियाँ भी बना सकते हैं।

4-अक्रिस्टलीय ठोस को गर्म करने पर एक निश्चित तापमान
पर ये क्रिस्टलीय हो जाते हैं, इसी क्रिस्टलीकरण के कारण प्राचीन सभ्यता की वस्तुओं में दुधियापन आ जाता है।

5-अक्रिस्टलीय ठोसों में द्रव के समान प्रवाह की प्रवृत्ति होती है यद्यपि यह प्रवाह बहुत धीमा होता है इस गुण के कारण इनको आभासी ठोस या अतिशीतित द्रव कहा जाता है इसी कारण से पुरानी इमारतों की खिडकियाँ और दरवाजों में लगे शीशे के नीचे का भाग शीर्ष भाग की अपेक्षा मोटा होता है क्योंकि काँच धीरे-धीरे प्रवाहित होकर नीचे के भाग को मोटा बना देता है।

6-ये समदैशिक होते हैं इनके भौतिक गुणों का मान सभी दिशाओं में समान होता है।

7-इनमें लघुपरासी व्यवस्था होती है।

8-ये विदलन गुण प्रदर्शित नहीं करते हैं।

उदाहरण- क्वार्ट्ज, कांच, रबर, प्लास्टिक, टेफ्लोन आदि।






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